एक रमणीय कविता ,आशा है आप सभी को पसंद आये ।
अगर बाहोँ मे होती
साँझ ढ़लते उसीके याद सताये
कितने सपने आते कैसे जताये ।
रात हो गई तन मे वो आ गई
बाहोंमे उसे रखके नशा चढ़ गई ।।
सोते हैं अकेले पास में तकिया
दिल में कितने अरमान गोरीया ।
नींदों में आके बाहोँ में होती वो
अपनी प्यार के राहोँ में होती वो ।।
चाँद देख रहा होता मेरे चाँदनी को
जुल्फें उसीके रमण करे कामिनी को ।
होंठों से होंठ बात करते रहते इच्छा से
जिस्म सिसकती चुम्बन के गुच्छा से ।।
नाभि के वो केन्द्र बिंदु कौतुक स्वरूप
जैसे मिला हो विवाह में यौतुक स्वरूप ।
धीरे धीरे जोरों से इश्क़ आइना देखती
कभी हँसती कभी लाज में सपना देखती ।।
तकिया भी महसूस हो महबूब हमें
कभी कभी प्यार में लगा मजरूब तुम्हें ।
यही खयाल से सुबह हो जाती रोज़
अच्छा होता अगर बाहोँ में रहती रोज़ ।।
©
Dr Rakesh R Mund








Beautiful
ReplyDeleteThank you ji
DeleteSo well written
ReplyDeleteThank you
DeleteAwesome bhai
ReplyDeleteThnx bhai
DeleteNicely completed!😍😍
ReplyDeleteThank you ji
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