Thursday, August 13, 2020

अगर बाहोँ मे होती वो

 

एक रमणीय कविता ,आशा है आप सभी को पसंद आये ।

अगर बाहोँ मे होती


साँझ ढ़लते उसीके याद सताये

कितने सपने आते कैसे जताये ।

रात हो गई तन मे वो आ गई

बाहोंमे उसे रखके नशा चढ़ गई ।।

सोते हैं अकेले पास में तकिया

दिल में कितने अरमान गोरीया ।


नींदों में आके बाहोँ में होती वो

अपनी प्यार के राहोँ में होती वो ।।


चाँद देख रहा होता मेरे चाँदनी को

जुल्फें उसीके रमण करे कामिनी को ।

होंठों से होंठ बात करते रहते इच्छा से

जिस्म सिसकती चुम्बन के गुच्छा से ।।


नाभि के वो केन्द्र बिंदु कौतुक स्वरूप

जैसे मिला हो विवाह में यौतुक स्वरूप ।

धीरे धीरे जोरों से इश्क़ आइना देखती

कभी हँसती कभी लाज में सपना देखती ।।


तकिया भी महसूस हो महबूब हमें

कभी कभी प्यार में लगा मजरूब तुम्हें ।


यही खयाल से सुबह हो जाती रोज़

अच्छा होता अगर बाहोँ में रहती रोज़ ।।




©

Dr Rakesh R Mund 

8 comments:

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